भारतीय संस्कृति के रक्षक या भक्षक?

हमारे देश मे कुछ ऐसे लोग है जो खुद को भारतीय संस्कृति का पुजारी मानते है परिणाम   संस्कृति की रक्षा करने के नाम पर लोगो को टॉर्चर करते है कही लड़कियो के जींस पहनने पर रोक लगाते है  तो कही वैलेंटाइन डे मनाते हुऐ प्रेमी जोड़ो को पीटते है, तोड़फोड़ करते है और  लिव इन रिलेशनशिप मे रह रहे लोगो को जीने नही देते. कभी कभी छोटे कपड़े या जींस पहने वाली  लड़कियो से छेड़छाडं करके उन्हे संस्कृति का पाठ पढ़ाने की वाहियात कोशिश करते है. पर सच कहे तो ये लोग भारतीय संस्कृति की रक्षा नही कर रहे है बल्कि उसे बदनाम कर रहे है.

दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी है जो भारतीय संस्कृति के नाम पर लकीर के फकीर बने बैठे जो किसी को पीटते तो नही है पर ऐसे विचारो वाले लोग न तो खुद जीते है न दूसरो को जीने देते है उदाहरण के तौर पर  फिल्म टॉयलेट- एक प्रथा मे कट्टर ब्राह्मण का किरदार निभा रहे अभिनेता सुधीर पाण्डेय का डायलॉग ‘ जिस आंगन मे हम तुलसी लगाते है उसी आंगन मे शौचालय.. . राम राम राम’  ऐसे कई रुढ़िवादी लोगो की सोच (जो वास्तव मे  संस्कृति के नाम पर महज लकीर के फकीर है) को उजागर करता है  जिन्होने संस्कृति को तमाशा बना कर रख दिया है. ऐसे लोगो की वजह से मॉडर्न जमाने के लोग  जो आजाद है वे भारतीय संस्कृति पर हंसते है तो दूसरी तरफ जिन्हे आजादी नही मिल रही वो भारतीय संस्कृति को कोसते है. मैने पहले  पौराणिक कहानियां सुनी तो दूसरी तरफ  साइंस की बाते पढ़ी तो मुझे  लगने लगा कि क्या वाकई हमारी हिन्दु संस्कृति मे इतनी कमियां है? कि लोग आडम्बर और रुढ़िवादिता से घिरे हुऐ है पर इन पौराणिक कहानियो को बहुत गहराई  से समझने के बाद मुझे पता चला कि  भारतीय संस्कृति मे ऐसा कुछ भी नही है जो हमारे मॉडर्न जमाने या साइंस  से मैच न करता हो जो लोग लिव इन रिलेशनशिप को पाश्चत्य संस्कृति का हिस्सा मानते है वे एकदम गलत है चुंकि साइंस भी कही कही न कही ये मानता है सबके पूर्वज हिन्दु थे क्योकि भारतीय संस्कृति सबसे पुरानी है और लाखो वर्ष पहले जब समाज बना था तब भी  विवाह की परम्परा बहुत बाद मे  बनाई गई थी उससे पहले स्त्री पुरुष लिव इन रिलेशन के जैसे  ही रहते थे,
वाकई विज्ञान के मुताबिक
इंसान पहले बन्दर था बाद मे  विकसित होकर इंसान बना और फिर पेड़ो की छाल या पशुओ की खाल पहनने लगा, पुराणो के अनुसार  भगवान शिव का पहनावा उस समय को उजागर करता है जब इंसान  पशुओ की खाल पहनने लगा था रही बात इंसान के बन्दर होने के प्रमाण की भगवान हनुमान के शरीर की बनावट बन्दर जैसी ही थी हम मान सकते है कि उनके वंशज वे बन्दर थे जिनका दिमाग तो विकसित होगया था पर शरीर वानर जैसा ही रहा.
हमारी सनातन संस्कृति के नाम पर लोग स्त्री की सीमाये तय करते है उन पर पाबन्दिया लगाते ये मानते हुये कि हमारी हिन्दु संस्कृति को पुरुष प्रधान मानते है जबकि भगवान शिव और माता पार्वती का अर्धनारीश्वर स्वरुप इस बात को प्रमाणित करता है कि स्री पुरुष दोनो समान महत्व रखते है,  हम तस्वीरो और मूर्तियो मे माता लक्ष्मी को भगवान विष्णु के चरणो के पास बैठा देख कर यही समझते कि पत्नी का स्थान पति चरणो मे है पर ऐसा कुछ भी नही था इसके पीछे कारण ये था कि  जैसा की आज  सभी लोग पैसे को सत्य से ज्यादा महत्व देते है उसी प्रकार उस समय भी जब
लोग लक्ष्मी (धन का प्रतीक) को उनके पति विष्णु (सत्य का प्रतीक)   से ज्यादा पूजते और महत्व देते थे तब माता लक्ष्मी ने  भगवान विष्णु के चरणो के समीप बैठने निर्णय लिया ताकि लोग ये समझे कि पैसा कितना भी जरुरी हो पर  सत्य
(अच्छाई और ईमानदारी) से ज्यादा महत्व नही रखता इस तरह माता लक्ष्मी खुद को अभिमान करने से भी बचा सकी.
आज जब भारतीय लोग स्त्री की क्षमता पर सवाल उठाने लगते जैसे कि ‘एक लड़की पहलवान नही बन सकती, बॉक्सर नही बन सकती’ वो ये क्यो भूल जाते है कि पौराणिक युग मे जब स्त्रियो को इतना कमजोर समझा जाने लगा कि राक्षस स्त्रियो के हाथो मरने का वरदान मांगने लगे क्योकि स्त्री युध्द नही करती थी तब उस युग मे नारी सशक्तिकरण किया गया था जिसमे माता पार्वती ने दुर्गा का रुप रख के स्रियो की सेना का बना कर उनका नेतृत्व किया और  राक्षसो का वध करके ये सिध्द किया कि स्त्री कुछ भी कर सकती है.
तो कहने का तात्पर्य है कि  कोई भी नियम हो स्थिति के अनुसार उसे न बदला गया तो वो रुढ़िवादी सोच का कारण बन जाता है और हमारी संस्कृति मे स्वयं  भगवान ने जन्म लेकर समय समय पर बदलाव किये जैसे कि भगवान परशुराम के जन्म से पहले तक ब्राह्मण का कार्य  भिक्षा मांगना  और कमजोर बन कर रहना था पर उन्होने शस्त्र उठा कर नियमो मे बदलाव किया क्योकि ब्राह्मणो पर कमजोर भिखारी होने का ठप्पा लगाकर लोग उनका शोषण  करने लगे थे.
मर्यादा पुरुषोत्तम  राम  बने बनाये नियमो का पालन करने की वजह से अपने जीवन काल मे संघर्ष करते रहे, इंतेहा तब हुई जब उन्हे अपनी निर्दोष पत्नी सीता का त्याग करना पड़ा उस नियम का पालन करने के चक्कर मे जो दरसअल बनाया गया था उन दुष्ट स्त्रियो के लिये जो अपने पति और परिवार को धोखा देकर दूसरे पुरुषो के साथ सम्बंध बनाती थी पर धीरे धीरे इस नियम का फायदा उठा कर निर्दोष स्त्रियो  की आजादी छीनी जाने लगी यहां तक कि अपहरण होने पर भी उन्हे कलंकित समझा जाने लगा और जो सजा जो दुष्ट स्रियो को मिलती थी वे उन्हे भी मिलने लगी तब  माता सीता ने स्त्रियो का मार्गदर्शन किया वे इस दुनिया की पहली सिंगल पैरेंट बनी  जिन्होने समाज को सिखाया कि एक स्त्री पिता के नाम के बगैर आत्मनिर्भर  बन कर अपने बच्चो का पालन पोषण कर सकती है, यद्यपि हमारे देश मे पिता का नाम होना बहुत जरूरी माना जाता है पर मॉडर्न लोग या रुढ़िवादी लोग इसका ठीकरा भी संस्कृति के सिर मे फोड़ते है जबकि पुराणो को समझे तो पिता के नाम को सिर्फ इसलिये महत्व दिया गया था क्योकि बच्चे को जन्म देने के बाद बच्चे पर मां का ज्यादा अधिकार था वही पिता का कम,  बच्चे पर दोनो का बराबर अधिकार रहे इसलिये बच्चे के लिये पिता का नाम आवश्यक कर दिया गया पर लकीर के फकीर लोगो ने अपनी संस्कृति के नाम पर यहां भी स्त्री का शोषण किया जिनमे पुरुषो से ज्यादा  खुद स्त्रियां शामिल रही है.
भगवान कृष्ण भगवान विष्णु का श्रेष्ठ अवतार माने जाते है क्योकि आखिरकार उन्होने हर समस्या का हल निकाला और समझाया कि बदलाव ही प्रकृति का नियम है’ जो आज अच्छा है कल वो बुरा भी होसकता है इसलिये परिस्थिति के अनुसार  खुद को बदलते रहो और हर वो नियम या कसम तोड़ दो जिससे तुम्हारा या दूसरो का जीना हराम होरहा हो, जियो और जीने दो.  समय समय बदलाव करने के लिये ईश्वर स्वयं प्रकट होता रहा.   चूंकि हिन्दु  संस्कृति  की खास बात ये भी रही है कि इसमे अन्य संस्कृतियो का सम्मान  करना,  शिष्टाचार और सभ्यता,  स्त्री, बड़ो और अतिथि का सम्मान करना शामिल है इसीलिये एक सच्चा हिन्दुस्तानी वही है जो सभी संस्कृतियो का सम्मान करता है.

लेकिन खुद को संस्कृति का रक्षक कहने वाले  लोग बिल्कुल इसका उल्टा कर रहे है कभी विदेशियो पर्यटको को ठगना या बदसलूकी करना, धर्म के नाम किसी किसी जान की परवाह ना करना अादि उनके गुण है.

जब तक भारत के लकीर के फकीर (रुढ़िवादी) लोग ये नही समझेंगे कि परिस्थिति के अनुसार नियम बनाये जाते है न कि नियमो के अनुसार परिस्थिति बनती है तब तक न तो हिन्दुस्तान  प्रगति करेगा और न ही  कोई हमारी भारतीय संस्कृति की महानता समझ पायेगा.

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